उत्तर प्रदेश के राजस्व तंत्र की सबसे अहम कड़ी — लेखपाल — की वर्षों से लंबित मांगों पर आज एक निर्णायक मोड़ आया। भूमि व्यवस्था आयुक्त महोदय के पत्र के क्रम में उत्तर प्रदेश लेखपाल संघ की प्रदेश कार्यकारिणी और राजस्व परिषद के उच्चाधिकारियों के बीच वार्ता आयोजित हुई। संगठन को उम्मीद थी कि इस बार आश्वासन के आगे बढ़कर कोई ठोस निर्णय या शासनादेश सामने आएगा। परंतु बैठक समाप्त होने पर स्थिति वहीं रही — लंबित मांगों पर न कोई निर्णय हुआ, न कोई शासनादेश जारी हुआ। संघ ने स्पष्ट शब्दों में कहा — वार्ता विफल रही है .
बैठक में क्या हुआ
वार्ता में संघ की ओर से प्रदेश नेतृत्व ने बिंदुवार उन सभी मांगों को रखा, जो वर्षों से फाइलों में घूम रही हैं —
- वेतन विसंगति एवं 2800 ग्रेड पे का निस्तारण
- अंतरजनपदीय/अंतरमंडलीय स्थानांतरण की व्यवस्था
- लंबित पदोन्नति की प्रक्रिया
- स्टेशनरी, वाहन एवं विशेष भत्तों में वृद्धि
- तकनीकी कर्मचारी का दर्जा
- कार्य हेतु आवश्यक संसाधन (लैपटॉप/मोबाइल/डेटा)
- नवनियुक्त लेखपालों का स्थायीकरण एवं प्रशिक्षण प्रमाण-पत्र
- ग्राम सचिवालयों में सुविधा एवं सुरक्षा
इन सभी बिंदुओं पर चर्चा हुई, परंतु किसी भी मांग पर समयबद्ध कार्यवाही का लिखित आदेश सामने नहीं आया। संघ का कहना है कि चर्चा और समाधान में अंतर है — और आज की बैठक चर्चा से आगे नहीं बढ़ सकी।
यह लड़ाई जनता के विरुद्ध नहीं, जनता के लिए है
कुछ लोग पूछ सकते हैं — इसमें आम आदमी का क्या? सच यह है कि जिस लेखपाल पर तीन हलके, बीस योजनाएँ और शून्य संसाधन हैं, उससे तेज़ और त्रुटिहीन काम की अपेक्षा अन्याय है। वरासत में देरी, जाँच में विलंब, खतौनी की गड़बड़ी — इनकी जड़ अक्सर व्यक्ति नहीं, व्यवस्था का असंतुलन होती है।
एक सम्मानित, संसाधन-संपन्न और पर्याप्त संख्या वाला लेखपाल कैडर सीधे किसान, विधवा, दिव्यांग, छात्र और आपदा-पीड़ित परिवार के हित में है। लेखपालों की मांगें पूरी होना राजस्व प्रशासन में निवेश है, खर्च नहीं।
उत्तर प्रदेश का लेखपाल गाँव में सरकार का पहला चेहरा है। जब बाढ़ आती है, जब ओले गिरते हैं, जब सीमा-विवाद में दो पक्ष आमने-सामने होते हैं — वह सबसे पहले पहुँचता है। आज जब वही लेखपाल अपने हक़ की बात कह रहा है, तो उसे सुनना शासन की ज़िम्मेदारी ही नहीं, समझदारी भी है।
यह आंदोलन एक मिसाल बनेगा — कि संवाद से समाधान संभव है। 17 अक्टूबर की तारीख़ प्रदेश के राजस्व तंत्र के लिए भारी साबित हो सकती है।
लेखपाल संघ के साथ प्रदेश के हज़ारों कर्मचारी, उनके परिवार और शुभचिंतक खड़े हैं। मांगें जायज़ हैं, माँगने का तरीक़ा मर्यादित है — अब निर्णय की बारी शासन की है।

